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गोद लेने के कानून में LGBTQ समुदाय को शामिल करने की जरूरत, संसदीय समिति ने की सिफारिश

नई दिल्ली. कार्मिक, लोक शिकायत, कानून और न्याय पर संसद की स्थायी समिति ने बच्चों को गोद लेने के कानून के संबंध में कहा है कि प्रक्रिया पर एक समान और व्यापक कानून लाने की आवश्यकता है. समिति ने सोमवार को कहा है कि यह कानून धर्म से परे सभी पर लागू होना चाहिए जिसमें एलजीबीटीक्यू समुदाय को भी शामिल किया जाना चाहिए. भाजपा नेता सुशील मोदी की अध्यक्षता में संसद की स्थायी समिति ने ‘अभिभावक और वॉर्ड कानून’ की समीक्षा करते हुए यह सिफारिश की है. समिति ने यह भी कहा कि ऐसा कानून अधिक पारदर्शी, जवाबदेह, कम नौकरशाही और धर्म के बावजूद सभी पर लागू होना चाहिए.

‘संरक्षकता (अभिभावक) और गोद लेने के कानूनों की समीक्षा’ पर अपनी रिपोर्ट में स्थायी समिति ने कहा है कि हिंदू दत्तक ग्रहण और रखरखाव अधिनियम (HAMA) और किशोर न्याय अधिनियम (जेजे अधिनियम) के अपने गुण और कमियां हैं. समिति ने आगे कहा है कि हालांकि HAMA के तहत निर्धारित गोद लेने की प्रक्रिया आसान है और जेजे अधिनियम में निर्धारित समय की तुलना में कम समय लगता है. जेजे अधिनियम के तहत गोद लेना पारदर्शी, जवाबदेह और सत्यापित होता है, लेकिन समिति ने यह भी रेखांकित किया है कि जेजे अधिनियम के तहत बनाए गए एडॉप्शन रेगुलेशन में अत्यधिक देरी के साथ एक विस्तृत प्रक्रिया का प्रावधान है.

समिति के मुताबिक गोद लेने की प्रक्रिया को अधिक आसान और कम बोझिल बनाने के लिए दोनों कानूनों में सामंजस्य स्थापित करने और गोद लेने पर एक समान और व्यापक कानून लाने की आवश्यकता है. कानून अधिक पारदर्शी, जवाबदेह, सत्यापन योग्य, कम नौकरशाही और सभी के लिए लागू हो, चाहे वह किसी भी धर्म का हो.

समिति ने रिपोर्ट में कहा है कि नया कानून संस्थागत बच्चों और परिवार के साथ रहने वाले बच्चों के लिए अलग गोद लेने की प्रक्रिया निर्धारित कर सकता है. रिश्तेदारों द्वारा गोद लेने के संबंध में, गोद लेने की प्रक्रिया अधिक लचीली और सरल होनी चाहिए और इसमें कम दस्तावेज शामिल होना चाहिए. समिति का मानना है कि नए कानून में एलजीबीटीक्यू समुदाय को भी शामिल किया जाना चाहिए.

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